जलवायु परिवर्तन के लिए अब भारतीय कार्पोरेट्स को अलग ढंग से सोचना होगा : शंकर वेंकटेश्वरन
February 2, 2020 • Daily Shabdawani Samachar

शब्दवाणी समाचार रविवार 2 फरवरी 2020 नई दिल्ली। नई दिल्ली में टेरी की ओर से जलवायु परिवर्तन पर आयोजित वल्र्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट में कारपोरेट सस्टेनेबिलिटी प्रमुखों, एनजीओ, नीति निर्धारकों और नागरिक संगठनों से जुडे़ लोगों ने जलवायु परिवर्तन के बारे में तुरंत किए जाने वाले उपाओं और उन बाधाओं के बारे में चर्चा की, जिन्हें तुरंत दूर किया जाना है।


आल्टरनेटिविज्म-गिव पेरिस ए चांस“ विषय पर आयोजित चर्चा में महिन्द्रा ग्रुप के चीफ सस्टेनेबिलिटी आॅफिसर अनिर्बा घोष ने कहा कि पेरिस समझौते में जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर मजबूत काम करने और वैश्विक तापमान की बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री तक सीमित करने की बात है। इस महत्वकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीवन जीने के वैकल्पिक तरीकों तथा उत्पादन और उपभोग के प्राकृतिक स्वरूप की बहुत जरूरत है। कारपोरेट्स और आम जनता दोनों को ही मिल कर इस दिशा में काम करना होगा।
यह चर्चा महिन्द्रा ग्रुप की ओर से हाल में कराए गए सर्वे पर आधारित थी, जिसमें बताया गया है कि 80 प्रतिशत भारतीय जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से परिचित हैं और 83 प्रतिशत इस विषय पर अपनी जीवनशैली में बदलाव भी करना चाहते हंै। सर्वे में यह भी सामने आया कि 88 प्रतिशत लोग इस बात को मानते हैं कि उनके व्यवहार से उनकी चिंता नजर नहीं आती है, क्योंकि पर्यावरण के अनुकूल किफायती, इको फ्रेंडली विकल्प उपलब्ध नहीं है, जिन्हें वे अपने रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल कर सकें। वहीं 89 प्रतिशत का मानना था कि यदि कम्पनियां वैकल्पिक उत्पाद और उपाय उपलब्ध कराएं तो वे जलवायु परिवर्तन की चुनौती का ज्यादा बेहतर ढंग से सामना कर सकते है।
आल्टरनेटिविज्म“ रिपोर्ट का लैंगिक डाटा यह बताता है कि भारतीय पुुरूष पर्यावरण के प्रति महिलाओं से ज्यादा जागरूक है। सर्वे में सामने आया कि 72 प्रतिशत पुरूषों और 67 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि वे जल संरक्षण को लेकर जागरूक हैं। इसी तरह 69 प्रतिशत पुरूष और 66 प्रतिशत महिलाओं में पानी की कमी से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता है।
डेमोग्राफी के लिहाज से यह सामने आया कि 25-34 वर्ष की आयुवर्ग के 80 प्रतिशत और 45-55 वर्ष की आयु के 81 प्रतिशत लोग सिंगल यूज प्लास्टिक से पडने वाले दुष्प्रभावों के बारे में सबसे ज्यादा चिंतित हंै। जब उत्पाद खरीदने से जुडे फेक्टर्स की बात आती है तो 45-54 वर्ष की आयु के 73 प्रतिशत और 25-34 वर्ष की आयु के 70 प्रतिशत पुरूष महिलाएं इस बात का ध्यान रखते हैं कि उत्पाद बनाने में किस तरह के ईंधन का उपयोग किया गया और उसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा।
महिन्द्रा के इस अध्ययन ने ही “आल्टरनेटिविज्म“ शब्द को इस संदर्भ में प्रचलित किया। जलवायु परिवर्तन के विषय में अपनाए जा रहे उपायों में वैकल्पिकता कुछ हद तक अभाव है और परम्परागत सोच चल रही है। सस्टेनेबल विशेषज्ञ यह स्वीकार करते हैं कि बिजनेस माॅडल, उत्पादन, कच्चा माल, इन्फ्रास्ट्रक्चर, व्यावसायिक व्यवस्थाओ, मूल्यांकन आदि में गैरपरम्परागत सोच से ही वैकल्पिक उपाय सामने आ सकते हंै।
टेरी के विशेषज्ञ फैलो डाॅ. संजय मित्रा ने वैकल्पिक सोच को जलवायु परिवर्तन के लिए जरूरी मानते हुए कहा कि आपका व्यवहार बहुत सहायक होता है। इसका उदाहरण है एलपीजी सब्सिडी को छोडना और स्वच्छ भारत अभियान को बडे पैमाने पर स्वीकार्यता मिलना। उन्होंने कहा कि किफायत के लिए कम कार्बन उत्सर्जन पर ध्यान देना होगा।
अन्य पैनलिस्ट ईक्यूब इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स की फाउंडिंग टीम से जुडे शंकर वेंकटेश्वरन ने कहा कि जब भी कोई काम करें तो उसके फायदे और नुकसान के बारे में पहले जान लें। वास्तव में हमें मितव्ययी और शांत होने की जरूरत है और कारपोरेटस की यह ग्रीन प्रोडक्टस उपलब्ध कराने में अहम भूमिका है।
महिन्द्रा ग्रुप जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराना चाहता है। ग्रुप ने पिछले एक दशक  में मोबिलिटी और एनर्जी, ग्रीन बिल्डिंग्स, माइक्रो इरीगेशन  और अन्य तकनीकों के जरिए पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद देने का प्रयास किया है।