हड्डियों के कैंसर के प्रति जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन  
January 31, 2020 • Daily Shabdawani Samachar

शब्दवाणी समाचार शुक्रवार 31 जनवरी 2020 नई दिल्ली। कैंसर व्यक्ति को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी तोड़ देता है। हड्डी के कैंसर (बोन कैंसर) के संबंध में भी यही बात लागू होती है। हालांकि स्तन और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर या ल्यूकेमिया की तुलना में बोन कैंसर के मामले बहुत अधिक सामान्य नहीं हैं लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि बोन कैंसर की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह जीवन के पहले 20 वर्षों के दौरान शरीर पर हमला करता है। कैंसर के एक हजार मामलों में से हड्डी के कैंसर के एक मामले होते हैं लेकिन बाल कैंसर के मरीजों में से करीब 6-7 प्रतिशत मरीज हड्डी के कैंसर के ही होते हैं। हड्डी के कैंसर में मरीज को कैंसर से प्रभावित अंग को खोना पड़ता है। इसके कारण न सिर्फ बच्चे की रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर होता है बल्कि उनका कैरियर संबंधी विकास भी बाधित होता है। साथ ही उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से भी यह प्रभावित करता है।


छह साल की उम्र में बच्चे खेल-कूद में व्यस्त होते हैं लेकिन इस उम्र में अचिन्त्य अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। इसी तरह की स्थिति का सामना पुणे का एक अन्य छात्र आदित्य को 15 साल की कम उम्र में भी करना पड़ रहा था।
जब दोनों बच्चों को मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, वैशाली लाया गया, तब आर्थोपेडिक ओंकोसर्जन डॉक्टर विवेक वर्मा की अगुआई वाली चिकित्सकों की टीम के समक्ष मुख्य उद्देश्य समुचित तकनीक का इस्तेमाल करके उनके अंगों को कटने से बचाना था।
पहला मामला: अचिन्त्य 6 वर्ष की आयु में ओस्टियोसारकोमा (हड्डी के कैंसर) से ग्रस्त पाया गया। उसके दाहिने पैर के फीमर (जांघ की हड्डी) में घातक ट्यूमर था। बच्चे के माता-पिता ने डॉक्टर को बताया कि उनका बच्चा लगातार भीषण दर्द का सामना कर रहा है। यह दर्द इतना अधिक था कि दर्द के कारण वह नींद से जाग जाता था। उसके प्रभावित क्षेत्र में सूजन थी और साथ ही पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर था। उसकी स्थिति और ट्यूमर की प्रकृति के बारे में जानने और जांच करने के बाद अचिन्त्य की 10 घंटे की सर्जरी की गई, जहां पहले हड्डी के कैंसर वाले हिस्से को शरीर से बाहर निकाला गया और फिर रेडिएशन की हाई डोज की मदद से कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर उस हिस्से को वापस री-इंप्लान्ट कर दिया गया। इलाज से उसे लाभ हुआ और सर्जरी के 10 दिन बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अब वह कैंसर से मुक्त है और खेल-कूद और पढ़ाई-लिखाई के अपने रोजमर्रे के रूटिन का पालन कर रहा है।
दूसरा मामला: पुणे के आदित्य में पहले 2016 में ओस्टियोसारकोमा का पता उसी समय चला जब वह केवल 15 साल का था। उसकी आगे जांच की गई और इसके बाद पुणे में ही एक अस्पताल में उसे 5-6 चक्र की कीमोथेरेपी दी गई। जब उसकी स्थिति में सुधार हो रहा था तभी 2019 में कैंसर ने उस पर दोबारा हमला कर दिया। उस समय उसकी उम्र 19 साल थी और दोबारा उसकी जांघ की हड्डी में कैंसर पाया गया। जब आदित्य को बहुत अधिक दर्द होने लगा तो उसे मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, वैशाली लाया गया। आगे की जांच के बाद रोग पर काबू करने के लिए हीमोथेरेपी की सलाह दी गई। इसके बाद जुलाई 2019 में ‘टोटल फीमर रिप्लेसमेंट’ सफलतापूर्वक किया गया। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो पारंपरिक रिप्लेसमेंट सर्जरी की तुलना में अधिक जटिल है और इसके लिए कूल्हे से लेकर घुटने तक की हड्डी की बदलने की आवश्यकता होती है।
फेफड़ों के नोड्यूल्स को मिनिमली इनवेसिव तकनीक द्वारा हटा दिया गया था। अब आदित्य कैंसर से मुक्त है और खुद बिना सहारे के चल-फिर रहा है।
मैक्स हॉस्पीटल के आर्थोपेडिक ओंकोसर्जन, डॉक्टर विवेक कुमार कहते हैं, ‘‘कुछ साल पहले, ऐसे मामलों में पहला उपाय अंग को काटकर निकालना होता था। हालांकि आज जो चिकित्सकीय प्रगति हुई है उसकी मदद से अंग को कटने से बचाया जा सकता है और साथ ही साथ कैंसर से भी छुटकारा दिलाया जा सकता है। किसी भी अन्य कैंसर की तरह, सही समय पर रोग का पता चलना बोन कैंसर के सफल उपचार की कुंजी है। दरअसल, अगर जल्दी पता चल जाए तो ओस्टियोसारकोमा का इलाज 80-90 प्रतिशत सफलता दर के साथ हो सकता है। चिकित्सक इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि किसी व्यक्ति के किसी अंग को काटने का शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कितना गहरा होता है, खास तौर पर बच्चों में।
उन्होंने कहा, ‘‘एक और महत्वपूर्ण सुझाव जो मैं माता-पिता के साथ साझा करना चाहूंगा, वह यह है कि उन्हें प्रमुख लक्षणों के बारे में अधिक जागरूक होना चाहिए और अगर परम्परागत उपचार के बाद भी ये लक्षण बने रहें तो उन्हें किसी चिकित्सा विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। इन लक्षणों में लगातार दर्द जिसके कारण बच्चे की नींद प्रभावित होती है, सूजन, फ्रैक्चर (जो बिना किसी खास चोट के आए) आदि शामिल हैं।